णव-णव-कज्ज-विसेसा तसु वि कालेसु होंति वत्थूणं
एक्केक्कम्मि य समये पुव्वुत्तर-भावमासिज्ज ॥229॥
अन्वयार्थ : [वत्थूणं] जीवादिक वस्तुओं के [तीसु वि कालेसु] तीनों ही कालों में [एक्केक्कम्मि य समये] एक-एक समय में [पुव्वुत्तरभावमासिज्ज] पूर्व-उत्तर परिणाम के आश्रय करके [णवणवकज्जविसेसा] नवीन-नवीन कार्य विशेष [होंति] होते हैं (नवीन-नवीन पर्यायें उत्पन्न होती हैं)

  छाबडा