
जीवो अणाइ -णिहणो परिणममाणो हु णव-णवं भावं
सामग्गीसु पवट्टदि क ज्जाणि समासदे पच्छा ॥231॥
अन्वयार्थ : [जीवो अणाइणिहणो] जीव द्रव्य अनादिनिधन है [णवणवं भावं परिणयमाणो हु] वह नवीन नवीन पर्यायरूप प्रगट परिणमता है [सामग्गीसु पवट्ठदि] वह ही पहिले सामग्री में प्रवृत्त होता है [पच्छा कजाणि समासदे] और बाद में कार्यों को प्राप्त होता है ।
छाबडा