+ अन्यस्वरूप होकर कार्य करने में दोष -
स-सरूवत्थो जीवो कज्जं साहेदि वट्टमाणं पि
खेत्ते एक्कम्मि ठिदो णिय-दव्वे संठिदो चेव ॥232॥
अन्वयार्थ : [जदि हि] यदि [जीवो] जीव [ससरूवत्थो] अपने स्वरूप में रहता हुआ [अण्णसरूवम्मि गच्छदे] पर स्वरूप में जाय तो [अण्णोण्णमेलणादो] परस्पर मिलने से (एकत्व हो जाने से) [सव्वं] सब द्रव्य [एकसरूवं हवे] एक स्वरूप हो जाय ।

  छाबडा