
स-सरूवत्थो जीवो अण्ण-सरूवम्मि गच्छदे जदि हि
अण्णेण्ण-मेलणादो एक्क -सरूवं हवे सव्वं ॥233॥
अन्वयार्थ : [जदि हि] यदि [जीवो] जीव [ससरूवत्थो] अपने स्वरूप में रहता हुआ [अण्णसरूवम्मि गच्छदे] पर स्वरूप में जाय तो [अण्णोण्णमेलणादो] परस्पर मिलने से [सव्वं] सब द्रव्य [एकसरूवं हवे] एक स्वरूप हो जाय ।
छाबडा