+ सर्वथा एक-स्वरूप मानने में दोष -
अहवा बंभ-सरूवं एक्कं सव्वं पि भण्णदे जदि हि
चंडाल-बंभणाणं तो ण विसेसो हवे को वि ॥234॥
अन्वयार्थ : [जदि हि अहवा बंभसरूवं एक्कं सव्वं पि मण्णदे] यदि सर्वथा एक ही वस्तु मानकर ब्रह्म का स्वरूप रूप सर्व माना जाय तो [चंडालबंभणाणं तो ण विसेसो हवे कोई] ब्राह्मण और चांडाल में कुछ भी विशेषता (भेद) न ठहरे ।

  छाबडा