
सव्वाणं दव्वाणं दव्व-सरू वेण होदि एयत्तं
णिय-णिय-गणु -भऐ णहि सव्वाणिवि होंति भिण्णाणि॥236॥
अन्वयार्थ : [सव्वाणं दव्वाणं दव्वसरूवेण एयत्तं होदि] सब ही द्रव्यों के द्रव्य-स्वरूप से तो एकत्व होता है [णियणियगुणमेएण हि सव्वाणि वि भिण्णाणि होंति] और अपने-अपने गुण के भेद से सब द्रव्य भिन्न-भिन्न हैं ।
छाबडा