
णो उप्पज्जदि जीवो दव्व-सरूवेण णेव णस्सेदि
तं चेव दव्व-मित्तं णिच्चत्तं जाण जीवस्स ॥239॥
अन्वयार्थ : [जीवो दव्वसरूवेण णेय णस्सेदि णो उप्पजदि] जीव-द्रव्य द्रव्य-स्वरूप से न नष्ट होता है और न उत्पन्न होता है [तं चेव दव्वमित्तं जीवस्स णिच्चतं जाण] अतः द्रव्यमात्र से जीव के नित्यत्व जानना चाहिये ।
छाबडा