+ गुण का स्वरूप -
सरिसो जो परिणामो अणाइ-णिहणो हवे गुणो सो हि
सो सामण्ण-सरू वो उप्पज्जदि णस्सदे णेय ॥241॥
अन्वयार्थ : [जो परिणामो सरिसो अणाइणिहणो सो हि गुणो हवे] जो द्रव्य का परिणाम सदृश (पूर्व उत्तर सब पर्यायों में समान) होता है अनादिनिधन होता है वह ही गुण है [सो सामण्णसरूवो उप्पज्जदि णस्सदे णेय] वह सामान्य-स्वरूप से उत्पन्न व नष्ट भी नहीं होता है ।

  छाबडा