+ ज्ञान-अद्वैतवाद का खंडन -
जदि सव्वमेव णाणं णाणा-रूवेहि संठिदं एक्कं
तोण ण वि किं पि विणेयं णेयेण विणा कहं णाणं ॥247॥
अन्वयार्थ : [जदि सव्वमेव एक्कं गाणं] जो सब वस्तुएं एक ज्ञान ही हैं [णाणारूवेहि संठिदं] वह ही अनेक रूपों में स्थित है [तो ण वि किं पि विणेयं] यदि ऐसा माना जाय तो ज्ञेय कुछ भी सिद्ध नहीं होता है [णेयेण विणा कहं णाणं] और ज्ञेय के बिना ज्ञान कैसे सिद्ध होवे ।

  छाबडा