जं सव्व-लोय-सिद्धं देहं गेहादि-बाहिरं अत्थं
जो तं पि णाण मण्णदि ण मणु दि सो णाण-णामं पि ॥249॥
अन्वयार्थ : [जं] जो [देहं गेहादिबाहिरं अत्थं] देह गेह आदि बाह्य-पदार्थ [सव्वलोयसिद्धं] सर्व लोक-प्रसिद्ध हैं, उनको भी ज्ञान ही मानें तो [सो णाणणामपि] वह वादी ज्ञान का नाम भी [ण मुणदि] नहीं जानता है ।

  छाबडा