जं सव्वं पि य संतं ता सो वि असंतओ कहं होदि
णत्थि त्ति किंचि तत्तो अहवा सुण्णं कहं मुणदि ॥251॥
अन्वयार्थ : [ज सव्वं पि य संतं] जो सब वस्तुएं सत्-रूप हैं - विद्यमान है [तासो वि असंतो कहं होदि] वे वस्तुएं असत्-रूप (अविद्यमान) कैसे हो सकती हैं [णस्थिति किंचि तत्तो अहवा सुण्णं कहं मुणदि] अथवा कुछ भी नहीं है ऐसा तो शून्य है ऐसा भी किसप्रकार मान सकते हैं ?

  छाबडा