णाणं ण जादि णेयं णेयं पि ण जादि णाण-देसम्मि
णिय-णिय-देस-ठियाणं ववहारो णाण-णेयाणं ॥256॥
अन्वयार्थ : [णाणं णेयं ण जादि] ज्ञान ज्ञेय में नहीं जाता है [णेयं पि णाणदेसम्मि ण जादि] और ज्ञेय भी ज्ञान के प्रदेशों में नहीं जाता है [णियणियदेसठियाणं] अपने-अपने प्रदेशों में रहते हैं तो भी ज्ञान और ज्ञेय के ज्ञेय-ज्ञायक व्यवहार है ।

  छाबडा