+ क्षायोपशमिक ज्ञान की सामर्थ्य -
मण-पज्जय-विण्णाणं आहेी-णाणं च दसे -पच्चक्खं
मदि-सिु द -णाणं क मसो विसद -पराक्े खं पराक्े खंच॥257॥
अन्वयार्थ : [मणपजयविण्णाणं ओहीणाणं च देसपञ्चक्खं] मनःपर्ययज्ञान और अवधिज्ञान ये दोनों तो देशप्रत्यक्ष है [मइसुयणाणं कमसो विसदपरोक्खं परोक्खं च] मतिज्ञान और श्रुतज्ञान क्रम से विशद-परोक्ष और परोक्ष हैं ।

  छाबडा