
इंदियजं मदि-णाणं जोग्गं जाणेदि पुग्गलं दव्वं
माणस-णाणं च पुणो सुय-विसयं अक्ख-विसयं च ॥258॥
अन्वयार्थ : [इंदियजं मदिणाणं] इन्द्रियों से उत्पन्न हुआ मतिज्ञान [जोग्गं पुग्गलं दव्यं जाणेदि] अपने योग्य विषय जो पुद्गल-द्रव्य उसको जानता है । [माणसणाणं च पुणो] और मन-सम्बन्धी ज्ञान [सुयविसयंअक्खविसयं च] श्रुतविषय और इन्द्रियों से जानने योग्य विषय को भी जानता है ।
छाबडा