
पंचिंदिय -णाणाणं मज्झे एगं च होदि उवजुत्तं
मण-णाणे उवजुत्तो इंदिय-णाणं ण जाणेदि ॥259॥
अन्वयार्थ : [पंचेदियणाणाणं मज्झे एगं च उवजुत्तं होदि] पांचों ही इन्द्रियों से ज्ञान होता है लेकिन एक काल एकेन्द्रिय-द्वार से ज्ञान उपयुक्त होता है । [मणणाणे उवजुत्ते] और जब मन ज्ञान से उपयुक्त हो [इंदियणाणं ण जाणेदि] तब इन्द्रिय-ज्ञान उत्पन्न नहीं होता है।
छाबडा