एक्के काले एक्कं णाणं जीवस्स होदि उवजुत्तं
णाणा-णाणाणि पुणो लद्धि-सहावेण वुच्चंति ॥260॥
अन्वयार्थ : [जीवस्स एक्के काले एगं णाणं उवजुत्तं होदि] जीव के एक काल में एक ही ज्ञान उपयुक्त (उपयोग की प्रवृत्ति) होता है [पुणो लद्धिसहावेण णाणाणाणाणि वुच्चंति] और लब्धि-स्वभाव से एक-काल में अनेक ज्ञान कहे गये हैं ।

  छाबडा