
जं वत्थु अणेयंतं एयंतं तं पि होदि सविपेक्खं
सुय-णाणेण णएहि य णिरवेक्खं दीसदे णेव ॥261॥
अन्वयार्थ : [जं वत्थु अणेयंत] जो वस्तु अनेकान्त है [तं सविपेक्खं एयंतं पि होदि] वह अपेक्षा-सहित एकान्त भी है [सुयणाणेण णयेहि य णिरवेक्खं दीसदे णेव] श्रुतज्ञान प्रमाण से सिद्ध किया जाय तो अनेकान्त ही है और श्रुतज्ञान प्रमाण के अंश, नयों से सिद्ध किया जाय तब एकान्त भी है, वह अपेक्षा-रहित नहीं है क्योंकि निरपेक्ष नय मिथ्या हैं, निरपेक्षा से वस्तु का रूप नहीं देखा जाता है ।
छाबडा