
सव्वं पि अणेयंतं परोक्ख-रूवेण जं पयासेदि
तं सुय-णाणं भण्णदि संसय-पहुदीहि परिचत्तं ॥262॥
अन्वयार्थ : [जं सव्वं पि अणेयंत परोक्खरूवेण पयासेदि] जो ज्ञान सब वस्तुओं को अनेकान्त, परोक्षरूप से प्रकाशित करता है - जानता है - कहता है और जो [संसयपहुदीहि परिचरां] संशय विपर्यय अनध्यवसाय से रहित है [तं सुयणाणं भण्णदि] उसको श्रुतज्ञान कहते हैं ।
छाबडा