लोयाणं ववहारं धम्म-विवक्खाइं जो पसाहेदि
सुय-णाणस्स वियप्पो सो वि णओ लिंग-संभूदो ॥263॥
अन्वयार्थ : [जो लोयाणं ववहारं] जो लोकव्यवहार को [धम्मविवक्खाइ पसाहेदि] वस्तु के एक धर्म की विवक्षा से सिद्ध करता है [सुयणाणस्स वियप्पो] श्रुतज्ञान का विकल्प (भेद) है [लिंगसंभूदो] लिंग से उत्पन्न हुआ है [सो वि णो] वह नय है ।

  छाबडा