
ते सावेक्खा सुणया णिरवेक्खा ते वि दुण्णया होंति
सयल-ववहार -सिद्धी सु-णयादो होदि णियमेण ॥266॥
अन्वयार्थ : [ते सावेक्खा सुणय] वे पहिले कहे हुए तीन प्रकार के नय परस्पर में अपेक्षा-सहित होते हैं तब तो सुनय हैं [णिरवेक्खा ते वि दुण्णया होति] और वे ही जब अपेक्षा-रहित सर्वथा एक-एक ग्रहण किये जाते हैं तब दुर्नय हैं [सुणयादो सयलववहारसिद्धी एियमेण होदि] और सुनयों से सर्व-व्यवहार वस्तु के स्वरूप की सिद्धि नियम से होती है ।
छाबडा