
जं जाणिज्जइ जीवो इंदिय-वावार-काय-चिट्ठाहिं
तं अणुमाणं भण्णदि तं पि णयं बहु-विहं जाण ॥267॥
अन्वयार्थ : [जं इंदियवावारकायचिट्ठाहिं जीवो जाणिजइ] जो इन्द्रियों के व्यापार और काय की चेष्टाओं से शरीर में जीव को जानते हैं [तं अणुमाणं भण्णदि] उसको अनुमान प्रमाण कहते हैं [तं पि जयं बहुविहं जाण] वह अनुमान ज्ञान भी नय है और अनेक प्रकार का है ।
छाबडा