सो संगहेण एक्को दु-विहो वि य दव्व-पज्जएहिंतो
तेसिं च विसेसादो णइगम -पहुदी हवे णाणं ॥268॥
अन्वयार्थ : [सो संगहेण एको] वह नय संग्रह करके कहिये तो (सामान्यतया) एक है [य दव्यपजएहिंतो दुविहो वि] और द्रव्यार्थिक पर्यायाथिक के भेद से दो प्रकार का है [तेसिं च विसेसादो णइगमपहुदी गाणं हवे] और विशेषकर उन दोनों की विशेषता से नैगमनय को आदि देकर हैं सो नय हैं और वे ज्ञान ही हैं ।

  छाबडा