
जेण सहावेण जदा परिणद -रूवम्मि तम्मयत्तादो
तं परिणामं साहदि जो वि णओ सो हु परमत्थो ॥277॥
अन्वयार्थ : [जदा जेण सहावेण] वस्तु जिससमय जिस स्वभाव से [परिणदरूवम्मि तम्मयत्तादो] परिणमनरूप होती है उस समय उस परिणाम से तन्मय होती है [तप्परिणाम साहदि] इसलिये उस ही परिणामरूप सिद्ध करती है - कहती है [जो वि णओ] वह एवंभूत नय है [सो हु परमत्थो] यह नय परमार्थरूप है ।
छाबडा