एवं विविह-णएहिं जो वत्थुं ववहरेदि लोयम्मि
दंसण-णाण-चरित्तं सो साहदि सग्ग मोक्खं च ॥278॥
अन्वयार्थ : [जो] जो पुरुष [लोयम्मि] लोक में [एवं विविहणएहिं] इस तरह अनेक नयों से [वत्थू ववहरेदि] वस्तु को व्यवहाररूप कहता है, सिद्ध करता है और प्रवृत्ति कराता है [सो] वह पुरुष [दसणणाणचरितं] दर्शन-ज्ञान-चारित्र को [च] और [सग्गमोक्खं] स्वर्ग-मोक्ष को [साहदि] सिद्ध (प्राप्त) करता है ।

  छाबडा