
विरला णिसुणहि तच्चं विरला जाणंति तच्चदो तच्चं
विरला भावहि तच्चं विरलाणं धारणा होदि ॥279॥
अन्वयार्थ : [विरला तच्चं णिसुणहि] संसार में विरले पुरुष तत्त्व को सुनते हैं [तच्च तच्चदो विरला जाणंति] सुनकर भी तत्त्व को यथार्थ विरले ही जानते हैं [विरला तचं भावहिं] जानकर भी विरले ही तत्त्व की भावना करते हैं [विरलाणं धारणा होदि] अभ्यास करने पर भी तत्त्व की धारणा विरलों के ही होती है ।
छाबडा