
तच्चं कहिज्जमाणं णिच्चल-भावेण गिण्हदे जो हि
तं चिय भावेदि सया सो वि य तच्चं वियाणेइ ॥280॥
अन्वयार्थ : [जो] जो पुरुष [कहिजमाणं तच्चं] गुरुओं के द्वारा कहे हुए तत्त्वों के स्वरूप को [णिच्चलभावेण गिण्हदे] निश्चल-भाव से ग्रहण करता है [तं चिय भावेदि सया] अन्य भावनाओं को छोड़कर उसी की निरन्तर भावना करता है [सो वि य तच्चवियाणेए] वह ही पुरुष तत्त्व को जानता है ।
छाबडा