
को ण वसो इत्थि-जणे कस्स ण मयणेण खंडियं माणं
को इंदिएहिं ण जिओ को ण कसाएहि संतत्तो ॥281॥
अन्वयार्थ : [इत्थिजणे वसो को ण] इस लोक में स्त्रीजन के वश कौन नहीं है ? [कस्स ण मयणेण खंडियं माणं] काम से जिसका मन खण्डित न हुआ हो ऐसा कौन है ? [को इंदिएहिं ण जिओ] जो इन्द्रियों से न जीता गया हो ऐसा कौन है ? [को ण कसाएहिं संतचो] और कषायों से तप्तायमान न हो ऐसा कौन है ?
छाबडा