
सो ण वसो इत्थि-जणे सो ण जिओ इंदिएहि मोहेण
जो ण य गिण्हदि गंथं अब्भंतर -बाहिरं सव्वं ॥282॥
अन्वयार्थ : [जो] जो पुरुष तत्त्व का स्वरूप जानकर [अब्भंतर बाहिरं सव्वं गंथं ण य गिण्हदि] बाह्य और अभ्यन्तर सब परिग्रह को ग्रहण नहीं करता है [सो ण वसो इत्थिजणे] वह पुरुष स्त्रीजन के वश में नहीं होता है [सो ण जियो इंदिएहिं मोहेण] वह ही पुरुष इन्द्रियों से और मोह कर्म से पराजित नहीं होता है ।
छाबडा