एवं लोय-सहावं जो झायदि उवसमेक्क -सब्भावो
सो खविय कम्म-पुंजं तिल्लोय -सिहामणी होदि ॥283॥
अन्वयार्थ : [जो] जो पुरुष [एवं लोयसहावं] इसप्रकार लोक के स्वरूप को [उसमेक्कसब्भावो] उपशम से एक स्वभावरूप होता हुआ [झायदि] ध्याता है (चितवन करता है) [सो कम्मपुंज खविय] वह पुरुष कर्म-समूह का नाश करके [तस्सेव सिहामणी होदि] उस ही लोक का शिखामणि होता है ।

  छाबडा