तत्थ वि असंख-कालं बायर-सुहुमेसु कुणइ परियत्तं
चिंतामणि व्व दुलहं तसत्तणं लहदि कट्ठेण ॥285॥
अन्वयार्थ : [तत्थ वि बायरसुहमेसु असंखकालं परियत्तं कुणइ] वहाँ पृथिवीकाय आदि में सूक्ष्म तथा बादरों में असंख्यात काल तक भ्रमण करता है [तमत्तण चिंतामणि व्व कट्ठण दुलहं लहदि] वहां से निकलकर त्रसपर्याय पाना चिंतामणि रत्न के पाने के समान दुर्लभ है।

  छाबडा