
सो वि मणेण विहीणो ण य अप्पाणं परं पि जाणेदि
अह मण-सहिदो होदि हु तह वि तिरिक्खो हवे रुद्दो ॥287॥
अन्वयार्थ : [सो वि मणेण विहीणो] विकलत्रय से निकलकर पंचेन्द्रिय भी होवे तो असैनी होता है [अप्पाणं परं पि ण य जाणेदि] आप और पर का भेद नहीं जानता सकता है [अह मणसहिदो होदि हु] यदि मनसहित भी होवे तो [तह वि तिरिक्खो हवे] तिर्यंच होता है [रुद्दो] रौद्र परिणामी बिलाव, घूघू सर्प, सिंह, मच्छ आदि होता है ।
छाबडा