रयणं चलप्पहे पिव मणुयत्तं सुट्ठु दुल्लहं लहिय
मिच्छो हवेइ जीवो तत्थ वि पावं समज्जेदि ॥290॥
अन्वयार्थ : [रयणं चउप्पहे पिव मणुअरा सुट्ठ दुल्लहं लहिय] जैसे चौराहे में पड़ा हुआ रत्न बड़े भाग्य से हाथ लगता है वैसे ही तिर्यंच से निकलकर मनुष्यगति पाना अत्यन्त दुर्लभ है [तत्थ वि जीवो मिच्छो हवेइ पावं समज्जेदि] ऐसा दुर्लभ मनुष्य-शरीर पाकर भी मिथ्यादृष्टि हो पाप ही करता है ।

  छाबडा