अह लहदि अज्जवत्तं तह ण वि पावेइ उत्तमं गोत्तं
उत्तम-कुले वि पत्ते धण-हीणो जायदे जीवो ॥291॥
अन्वयार्थ : [अह लहदि अजवंत] मनुष्यपर्याय पाकर यदि आर्य-खण्ड में भी जन्म पावे तो [तह वि उत्तम गोत्तं ण पावेइ] उत्तम गोत्र (ऊँच कुल) नहीं पाता है [उत्तम कुले वि पत्ते] यदि ऊँच कुल भी प्राप्त हो जाय तो [जीवो धणहीणो जायदे] यह जीव धनहीन दरिद्री हो जाता है उससे कुछ सुकृत नहीं बनता है, पाप ही में लीन रहता है ।

  छाबडा