
अह धण-सहिदो होदि हु इंदिय-परिपुण्णदा तदो दुलहा
अह इंदिय-संपुण्णे तह वि सरोओ हवे देहो ॥292॥
अन्वयार्थ : [अह धनसहिओ होदि हु] यदि धन सहित भी होवे [तदो इन्दियपरिपुण्णदा दुलहा] तो इन्द्रियों की परिपूर्णता पाना अत्यन्त के दुर्लभ है [अह इन्दिय संपुण्णो] यदि इन्द्रियों की सम्पूर्णता भी पावे [तह वि देहो सरोओ हवे] तो देह रोग-सहित पाता है, निरोग होना दुर्लभ है ।
छाबडा