अह होदि सील-जुत्तो तो वि ण पावेइ साहु-संसग्गं
अह तं पि कह वि पावदि सम्मत्तं तह वि अइदुलहं ॥294॥
अन्वयार्थ : [अह सीलजत्तो होदि] यदि शील (उत्तम) स्वभाव सहित भी हो जाता है [तह वि साहुसंमग्गं ण पावेइ] तो साधु पुरुषों का संसर्ग (संगति) नहीं पाता है [अह तं पि कह वि पावदि] यदि वह भी पा जाता है [तह वि सम्मत्वं अइदुलह] तो सम्यक्त्व पाना (श्रद्धान होना) अत्यन्त दुर्लभ है ।

  छाबडा