
चदु-गदि -भव्वो सण्णी सुविसुद्धो जग्गमाण-पज्जत्तो
संसार-तडे णियडो णाणी पावेइ सम्मत्तं ॥307॥
अन्वयार्थ : [चउगदिभवो सण्णी] पहिले तो भव्यजीव होवे क्योंकि अभव्य के सम्यक्त्व नहीं होता है, चारों ही गतियों में सम्यक्त्व उत्पन्न होता है परन्तु मन सहित के ही उत्पन्न हो सकता है, असैनी के उत्पन्न नहीं होता है [सुविसुद्धो] उस में भी विशुद्ध परिणामी हो, शुभ लेश्या सहित हो, अशुभ लेश्या में भी शुभ लेश्या के समान कषायों के स्थान होते हैं उनको उपचार से विशुद्ध कहते हैं, संक्लेश परिणामों में सम्यक्त्व उत्पन्न नहीं होता है [जग्गमाणपजतो] जगते हुए के होता है, सोये हुए के नहीं होता है, पर्याप्त के होता है, अपर्याप्त अवस्था में नहीं होता है [संसारतडे नियडो] संसार का तट जिसके निकट आ गया हो जिसका अर्द्धपुद्गल परावर्तन काल से अधिक संसार-भ्रमण शेष हो उसको सम्यक्त्व उत्पन्न नहीं होता है [णाणी] ज्ञानी हो अर्थात् साकार उपयोगवान् हो, निराकार दर्शनोपयोग में सम्यक्त्व उत्पन्न नहीं होता है [सम्म पावे] ऐसे जीव के सम्यक्त्व की उत्पत्ति होती है ।
छाबडा