
सत्तण्हं पयडीणं उवसमदो होदि उवसमं सम्मं
खयदो य होदि खइयं केवलि-मूले मणूसस्स ॥308॥
अन्वयार्थ : [सत्तण्हं पयडीणं उबसमदो उत्सम सम्मं होदि] मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यकप्रकृति मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ इन सात मोहनीयकर्म को प्रकृतियों के उपशम होने से उपशम सम्यक्त्व होता है [य खयदो खइयं होदि] और इन सातों मोहनीय कर्म को प्रकृतियों के क्षय होने से क्षायिक-सम्यक्त्व उत्पन्न होता है [केवलिमूले मणूसस्स] यह क्षायिक सम्यक्त्व केवलज्ञानी तथा श्रुतकेवली के निकट कर्मभूमि के मनुष्य के ही उत्पन्न होता है ।
छाबडा