गिण्हदि मुंचदि जीवो वे सम्मत्ते असंख-वाराओ
पढम-कसाय-विणासं देस-वयं कुणदि उक्कस्सं ॥310॥
अन्वयार्थ : [जीवो] यह जीव [वे सम्म] औपशमिक क्षायोपशमिक ये दो तो सम्यक्त्व [पढमकसायविणासं] अनन्तानुबन्धी का विनाश अर्थात् विसंयोजनरूप, अप्रत्याख्यानादिकरूप परिणमाना [देसवयं] और देशव्रत इन चारों को [असंखवाराओ] असंख्यातबार [गिण्हदि मुंचदि] ग्रहण करता है और छोड़ता है [उकिट्ठ] यह उत्कृष्टता से कहा है ।

  छाबडा