जो तच्चमणेयंतं णियमा सद्दहदि सत्त-भंगेहिं
लोयाण पण्ह-वसदो ववहार-पवत्तणट्ठं च ॥311॥
जो आयरेण मण्णदि जीवाजीवादि णव-विहं अत्थं
सुद -णाणेण णएहि य सो सद्दिट्ठी हवे सुद्धो ॥312॥
अन्वयार्थ : [जो सत्तभंगेहिं अणेयंतं तच्चं णियमा सद्दहदि] जो पुरुष सात भंगों से अनेकान्त तत्त्वों का नियम से श्रद्धान करता है [लोयाण पण्हवसदो ववहारपवत्तणट्ठं च] क्योंकि लोगों के प्रश्न के वश से विधि-निषेध वचन के सात ही भंग होते हैं इसलिये व्यवहार की प्रवृत्ति के लिए भी सात भंगों के वचन की प्रवृत्ति होती है [जो जीवाजीवादि णवविहं अत्थं] जो जीव अजीव आदि नौ प्रकार के पदार्थों को [सुदणाणेण णएहि य] श्रुतज्ञान प्रमाण से तथा उसके भेदरूप नयों से [आयरेण मण्णदि] अपने आदर - यत्न उद्यम से मानता है - श्रद्धान करता है [सो सुद्धो सदिट्ठी हवे] वह शुद्ध सम्यग्दृष्टि होता है ।

  छाबडा