जो ण य कुव्वदि गव्वं पुत्त-कलत्ताइ-सव्व-अत्थेसु
उवसम-भावे भावदि अप्पाणं मुणदि तिणमित्तं ॥313॥
अन्वयार्थ : [जो] जो सम्यग्दृष्टि होता है वह [पुत्तकलत्ताइसव्वअत्थेसु] पुत्र कलत्र आदि सब पर-द्रव्य तथा पर-द्रव्यों के भावों में [गव्वं ण य कुव्वदि] गर्व नहीं करता है [उवसमभावे भावदि] उपशम भावों को भाता है, [अप्पाणं तिणमित्तं मणदि] अपनी आत्मा को तृण के समान हीन मानता है ।

  छाबडा