
विसयासत्तो वि सया सव्वारंभेसु वट्टमाणो वि
मोह-विलासो एसो इदिसव्वं मण्णदे हेयं ॥314॥
अन्वयार्थ : [विसयासत्तो वि सया] यद्यपि इन्द्रिय-विषयों में आसक्त है [सव्वारंभेसु वट्टमाणो वि] त्रस स्थावर जीवों का घात जिनमें होता है ऐसे सब आरम्भों में वर्तमान है, अप्रत्याख्यानावरण आदि कषायों के तीव्र उदय से विरक्त नहीं हुआ है [इदि सव्वं हेयं मण्णदे] तो भी सबको हेय मानता है और ऐसा जानता है कि [एसो मोहविलासो] यह मोह का विलास है ।
छाबडा