उत्तम-गुण-गहण-रओ उत्तम-साहूण विणय-संजुत्तो
साहम्मिय -अणुराई सो सद्दिट्ठी हवे परमो ॥315॥
अन्वयार्थ : [उत्तमगुणगहणरओ] (सम्यग्दृष्टि) उत्तम गुण (सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र तप आदि) के ग्रहण करने में अनुरागी, [उत्तमसाहूण विणयसंजत्तो] उन (गुणों के धारक) उत्तम साधुओं में विनय संयुक्त, [साहम्मिय अणुराई] अपने समान (सम्यग्दृष्टि) साधर्मियों में अनुरागी होता है (वात्सल्य गुणसहित) होता है [सो परमो सद्दिट्ठी हवे] वह उत्तम सम्यग्दृष्टि होता है ।

  छाबडा