देह-मिलयं पि जीवं णिय-णाण-गुणेण मुणदि जो भिण्णं
जीव-मिलियं पि देहं कंचुव -सरिसं वियाणेइ ॥316॥
अन्वयार्थ : [देहमिलियं पि जीवं] देह जीव से मिली हुई होने पर भी [णियणाणगुणेण जो भिण्णं मणदि] ज्ञानगुण द्वारा अपने को देह से भिन्न ही जानता है [जीव मिलियं पि देहं] जीव देह से मिला हुआ होने पर भी [कंचुवसरिसं वियाणेई] तो भी उसको कंचुक (कपड़े का जामा) समान जानता है ।

  छाबडा