
दोस-सहियं पि देवं जीव-हिंसाइ -संजुदं धम्मं
गंथासत्तं च गुरुं जो भण्णदि सो हु कुद्दिट्ठी ॥318॥
अन्वयार्थ : [जो] जो जीव [दोससहियं पि देवं] दोष-सहित देव को तो देव [जीवहिंसाइसंजुदं धममं] जीव हिंसादि सहित को धर्म [गंथासत्तं च गुरुं] परिग्रह में आसक्त को गुरु [मण्णदि] मानता है [सो हु कुद्दिट्ठी] वह प्रगटरूप से मिथ्यादृष्टि है ।
छाबडा