
ण य को वि देदि लच्छी ण को वि जीवस्स कुणदि उवयारं
उवयारं अवयारं क म्मं पि सुहासुहं कु णदि ॥319॥
अन्वयार्थ : [को वि लच्छी ण य देदि] इस जीव को कोई लक्ष्मी नहीं देते हैं [जीवस्स को वि उवयारं ण कुणदि] इस जीव का कोई अन्य उपकार भी नहीं करता है [सुहासुहं कम्म पि उवयारं अवयारं कुणदि] जीव के पूर्व-संचित शुभ-अशुभ कर्म ही उपकार तथा अपकार करते हैं ।
छाबडा