एवं जो णिच्छयदो जाणदि दव्वाणि सव्व-पज्जाए
सो सद्दिट्ठी सुद्धो जो संकदि सो हु कुद्दिट्ठी ॥323॥
अन्वयार्थ : [जो एवं णिच्चयदो] जो इसप्रकार के निश्चय से [दव्याणि सव्वपजाए जाणदि] सब द्रव्य (जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल) इनको और इन द्रव्यों की सब पर्यायों को सर्वज्ञ के आगम के अनुसार जानता है - श्रद्धान करता है [सो सुद्धो सहिडी] वह शुद्ध सम्यग्दृष्टि होता है [जो संकदि सो हु कुद्दिट्ठी] जो ऐसा श्रद्धान नहीं करता है शंका (संदेह) करता है वह प्रगटरूप से मिथ्यादृष्टि है ।

  छाबडा