
जो ण विजाणदि तच्चं सो जिण-वयणे करेदि सद्दहणं
जं जिणवरेहिं भणियं तं सव्वमहं समिच्छामि ॥324॥
अन्वयार्थ : [जो तच्चं ण विजाणइ] जो जीव तत्त्वार्थ को नहीं जान पाता है [सो जिणवयणे सदहणं करेदि] वह जीव जिनवचनों में ऐसा श्रद्धान करता है कि [जंजिणवरेहि भणिय] जो जिनेश्वर देव ने तत्त्व कहा है [तं सव्वमहं समिच्छामि] उस सब ही को मैं भले प्रकार इष्ट करता हूँ ।
छाबडा