
पंचाणुव्वय-धारी गुण-वय-सिक्खा-वएहिं सुजुत्तो
दिढ-चित्तो सम-जुत्तो णाणी वय-सावओ होदि ॥330॥
अन्वयार्थ : [पंचाणुव्वयधारी] जो पाँच अणुव्रतों का धारक हो [गुणवयसिक्खावएहिं संजुत्तो] तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत सहित हो [दिढचित्तो समजत्तो] दृढ़चित्त हो और समताभाव सहित हो [णाणी वयसावओ होदि] ज्ञानवान हो, वह व्रतप्रतिमा का धारक श्रावक है ।
छाबडा