+ अहिंसाणुव्रत -
तस-घादं जो ण करदि मण-वय-काएहि णेव कारयदि
कुव्वंतं पि ण इच्छदि पढम-वयं जायदे तस्स ॥331॥
अन्वयार्थ : [तसघादं जो ण करदि मणवयकाएहि णेव कारयदि] जो श्रावक त्रसजीव (दो,तीन,चार,पंच इन्द्रिय) का घात मन-वचन-काय से आप नहीं करे, दूसरे से नहीं करावे [कुवंतं पि ण इच्छदि] और अन्य को करते हुए को इष्ट (अच्छा) नहीं माने [तस्स पढमवयं जायदे] उसके पहिला अहिंसाणुव्रत होता है ।

  छाबडा