जो वावरेइ सदओ अप्पाण-समं परं पि मण्णंतो
णिंदण-गरहण-जुत्तो परिहरमाणो महारंभे ॥332॥
अन्वयार्थ : [जो सदओ वावरइ] जो दयासहित तो व्यापार कार्य में प्रवृत्ति करता है [अप्पाणसमं परं पि मण्णतो] सब प्राणियों को अपने समान मानता है [निंदणगर हणजुत्तो] निंदा और गर्हा सहित है (व्यापारादि कार्यों में हिंसा होती है उसकी अपने मन में अपनी निंदा करता है, गुरुओं के पास अपने पापों को कहता है सो गर्हा सहित है, जो पाप लगते हैं उनकी गुरुओं की आज्ञा-प्रमाण आलोचना प्रतिक्रमण आदि प्रायश्चित्त लेता है) [महारंभे परिहरमाणो] जिनमें त्रस हिंसा बहुत होती हो ऐसे बड़े व्यापार आदि के कार्य महारम्भों को छोड़ता हुआ प्रवृत्ति करता है ।

  छाबडा